Nakuul Mehta Says Amitabh Bachchan Deewaar Misrepresented Masculinity: टीवी जगत के स्टार एक्टर नकुल मेहता ने 70 के दशक में आई सलीम-जावेद और अमिताभ बच्चन की फिल्मों को मैस्क्युलिनिटी को गलत तरीके से पेश करने का जिम्मेदार बता दिया है। नकुल ने बताया कि अमिताभ बच्चन की ‘दीवार’जैसी फिल्मों ने पुरुषों पर मर्दानगी की एक गलत छाप छोड़ी है।
नकुल हाल ही में Be a Man Yaar पर नजर आए, जहां पर उन्होंने मैस्क्युलिनिटी पर अपने विचार रखे हैं। नकुल ने अमिताभ बच्चन की फिल्म दीवार का उदाहरण देते हुए मैस्क्युलिनिटी पर विचार साझा करते हुए कहा कि, ‘’एंग्री यंग मैन का आइडिया, जो लेखक सलीम खान और जावेद अख्तर द्वारा हिंदी फिल्मों में आया, वास्तव में लोगों को मर्दानगी का गलत विचार सिखाया गया। फिल्म दीवार में अमिताभ बच्चन ग्रेट थे, लेकिम मुझे हमेशा शशि कपूर के किरदार में अधिक दिलचस्पी रहेगी, जिनके समर्थन के बिना हीरो उतना मजबूत नहीं होता जितना वे थे।’’
नकुल ने आगे कहा कि, ‘’पॉप-कल्चर और फिल्मों ने मर्द होने के अर्थ की परिभाषा को कुछ हद तक बिगाड़ दिया है। और जबकि सलीम-जावेद बेहतरीन लेखक थे, लेकिन 70 के दशक में उन्होंने मर्द को जिस तरह दिखाया, वैसा हमें बिल्कुल भी नहीं होना चाहिए। मर्द को दर्द नहीं होता, लड़के रोते नहीं…बच्चन की भूमिकाएँ बहुत महत्वाकांक्षी थीं, और उनकी भूमिकाओं ने पुरुषों की एक अलग परिभाषा बना दी।’’
नकुल ने अंत में इस फिल्म में शशि कपूर के किरदार की तारीफ करते हुए कहा कि, ‘’मैं शशि कपूर का हमेशा से ही फैन रहा हूं। आप ‘दीवार’ में अमिताभ बच्चन से अपनी आंखें नहीं हटा सकते हैं, लेकिन बच्चन का यह किरदार शशि कपूर के किरदार की मर्यादा के कारण अच्छा लगता है। सच्चाई, मर्यादा, असुरक्षा और मजबूती जो वे लाते हैं। दुर्भाग्य से, वास्तविक जीवन में महिलाओं को हमारे साथ ऐसा ही व्यवहार करना पड़ता है। मैंने अपनी मां, अपनी बहन, अपनी पत्नी और सास में ये गुण देखे हैं, क्योंकि महिलाएं खुद को पुरुषों की तुलना में अधिक नाजुक होने देती हैं।’’

