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BJP पर शिवसेना का हमला, अयोध्या में राम मंदिर बनाने के लिए चंदा वसूलने पर खड़े हुए सवाल

अयोध्या (Ayodhya) में भव्य राम मंदिर बनाने के लिए चंदा वसूलने को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। शिवसेना (Shiv Sena) ने अपने मुखपत्र सामना में चंदा वसूलने को लेकर कई सवाल उठाए हैं।


Ram Mandir Donation Campaign: अयोध्या (Ayodhya) में भव्य राम मंदिर बनाने के लिए चंदा वसूलने को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। शिवसेना (Shiv Sena) ने अपने मुखपत्र सामना में चंदा वसूलने को लेकर कई सवाल उठाए हैं। शिवसेना ने पूछा कि मंदिर निर्माण कार्य के लिए हर घर से चंदा इकट्ठा करनेवाली ‘टोली’ बनाई गई है। 4 लाख स्वयंसेवक चंदे के लिए हर द्वार पर जाएंगे. ये स्वयंसेवक कौन हैं? उनकी नियुक्ति किसने की? शिवसेना ने अपने मुखपत्र में कहा कि कोर्ट का निर्णय आते ही प्रधानमंत्री मोदी की उपस्थिति में मंदिर का भूमि पूजन भी हुआ। मंदिर का काम तेजी से चल रहा है अर्थात 2024 के लोकसभा चुनाव के पहले तंबू में विराजमान रामलला मंदिर में विराजमान हो जाएंगे। अब इस मंदिर निर्माण कार्य के लिए हर घर से चंदा इकट्ठा करनेवाली ‘टोली’ बनाई गई है, जोकि मजेदार है।

शिवसेना (Shiv Sena) ने कहा कि 4 लाख स्वयंसेवक चंदे के लिए हर द्वार पर जाएंगे। ये स्वयंसेवक कौन हैं? उनकी नियुक्ति किसने की? मंदिर निर्माण का खर्च लगभग 300 करोड़ है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी ने राम मंदिर निर्माण की निधि की चिंता न करें, ऐसा कहा है। मर्यादा पुरुषोत्तम राम का मंदिर देश की अस्मिता का मंदिर है और इसके लिए दुनिया भर के हिंदुत्ववादियों ने पहले ही खजाना खाली कर दिया है। इसलिए घर-घर जाकर दान इकट्ठा करने से क्या हासिल होगा?

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शिवसेना (Shiv Sena) ने पूछा कि इस काम के लिए 4 लाख स्वयंसेवकों की नियुक्ति हुई होगी तो उन स्वयंसेवकों का मुख्य संगठन कौन-सा है? यह स्पष्ट हो जाएगा तो अच्छा होगा। चंदे के नाम पर ये 4 लाख स्वयंसेवक एकाध पार्टी के राजनीतिक प्रचारक के रूप में घर-घर जानेवाले होंगे तो ये मंदिर के लिए अपना खून बहानेवालों की आत्मा का अपमान होगा। मंदिर की लड़ाई राजनीतिक नहीं थी। वह समस्त हिंदू भावनाओं का उद्रेक था। उस उद्रेक से ही हिंदुत्व की चिंगारी जल उठी और आज की भाजपा उसी आग पर पकी रोटियां खा रही है।

शिवसेना (Shiv Sena) ने कहा कि 4 लाख स्वयंसेवक मंदिर के चंदे के निमित्त संपर्क अभियान चलानेवाले हैं। यह संपर्क अभियान मतलब राम की आड़ में 2024 का चुनाव प्रचार है. राम के नाम का राजनीतिक प्रचार रुकना ही चाहिए। मंदिर निर्माण के पश्चात चुनाव प्रचार में राम नहीं, बल्कि विकास होना चाहिए, लेकिन ऐसा नहीं दिख रहा। वनवास समाप्त होने के बावजूद श्रीराम की अड़चन जारी है।

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