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मुख्यमंत्री बनने के बाद Nitish Kumar के सामने होंगी ये 5 बड़ी चुनौतियां

Nitish Kumar Political Challenge: बिहार (Bihar) में कई चुनौतियों के बाद एक बार फिर एनडीए (NDA) ने बहुमत का आंकड़ा हासिल कर लिया है। जिसके बाद एक बार फिर से नीतीश कुमार (Nitish Kumar) बिहार के सीएम (CM) बन गए है।

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Nitish Kumar Political Challenge: बिहार (Bihar) में कई चुनौतियों के बाद एक बार फिर एनडीए (NDA) ने बहुमत का आंकड़ा हासिल कर लिया है। जिसके बाद एक बार फिर से नीतीश कुमार (Nitish Kumar) बिहार के सीएम (CM) बन गए है। आपको बता दे नीतीश कुमार सातवीं बार बिहार के मुख्यमंत्री (Bihar CM) पद की शपथ लेने वाले है। हलाकि इस बार उनके लिए सबकुछ पहले जैसा आसान नहीं होगा। क्युकी इस बार सियासी समीकरण और हालात दोनों ही अलग हैं, जिसके चलते नीतीश के सामने चुनौतियां भी कई हैं। एक तरफ तो उन्हें मजबूत विपक्ष का सामना करना होगा तो वही दूसरी तरफ अपने चार सहयोगियों के साथ संतुलन में रहना होगा।

  • सहयोगी दलों के साथ संतुलन

नीतीश कुमार (Nitish Kumar) अभी तक बिहार में अपने एक मात्र सहयोगी बीजेपी के साथ सरकार चलाते रहे हैं, लेकिन इस बार एनडीए में चार सहयोगी हैं। इस बार बीजेपी के साथ-साथ जीतन राम मांझी की हम और मुकेश सहनी की वीआईपी भी गठबंधन का हिस्सा हैं। ये दोनों पार्टियां न सिर्फ गठबंधन का हिस्सा भर हैं बल्कि सरकार चलाने के लिए जरूरी बहुमत के आंकड़े के भागीदार भी हैं। एनडीए को ऐसा जनादेश मिला है, जिसमें नीतीश की कुर्सी के चार पाए के चार मालिक हैं।

मतलब, एनडीए में से किसी एक सहयोगी के नाराज होने या फिर इधर-उधर होने का मतलब है सरकार के लिए जरूरी बहुमत के आंकड़ों से दूर हो जाना। जाहिर है ऐसे में सबकी अपनी शर्तें होंगी और सबका अपना नजरिया भी। नीतीश के मंत्रिमंडल से लेकर सरकारों के फैसलों में इसका दबाव बहुत साफ दिखेगा। ऐसे में नीतीश कुमार के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने चारों सहयोगी दलों के साथ संतुलन और सामंजस्य बनाकर चलने की होगी।

  • सरकार पर नियंत्रण कैसे रखेंगे

नीतीश कुमार (Nitish Kumar) पूरी मजबूती और बिना हस्तक्षेप के काम करने वाले मुख्यमंत्री माने जाते रहे हैं। विरोधी उनके काम करने की शैली को बिना किसी से विचार-विमर्श किए बगैर फैसला लेने वाले मुख्यमंत्री के तौर पर करते रहे हैं। बिहार में समीकरण ऐसे हैं कि नीतीश के लिए सरकार चलाने और खुलकर निर्णय लेने की आजादी पहले जैसी नहीं होगी। नीतीश कुमार को अपने नियंत्रण में रखकर शासन करने की चुनौतियों का सामना करना होगा। हालांकि, 2015 में आरजेडी की अधिक सीट लेकर सरकार में हिस्सेदार और हस्ताक्षेप बढ़ा तो कुछ ही महीने बाद के कई मसलों पर नीतीश कुमार असहज हो गए थे। ऐसे में देखना है कि इस बार सरकार पर किस तरह से वो नियंत्रण रख पाते हैं और किस तरह फैसले लेते हैं।

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  • मंत्रिमंडल में जेडीयू अल्पमत में रहेगी

नीतीश कुमार (Nitish Kumar) की पार्टी जेडीयू की सरकार के अंदर हिस्सेदारी भी कम होगी। एनडीए में बीजेपी सबसे बड़े दल के रूप में है और जेडीयू दूसरे नंबर की पार्टी है. ऐसे में नीतीश कैबिनेट में बीजेपी और जेडीयू ही नहीं बल्कि जीतनराम मांझी की HAM और मुकेश सहनी की वीआईपी पार्टी को भी मंत्री पद देने होंगे, क्योंकि उनके सहारे ही बहुमत का आंकड़ा है। विधानसभा में जिसकी जितनी हिस्सेदारी, उसकी कैबिनेट में उतनी भागेदारी के फॉर्मूले पर बिहार में कैबिनेट की हिस्सेदारी मिलती रही है। इस लिहाज से नई कैबिनेट में बीजेपी के मंत्री अधिक होंगे तो जेडीयू के पिछली बार से कम होंगे. बिहार में ज्यादा से ज्यादा 36 मंत्री बने सकते हैं। इस तरह से जेडीयू मंत्रिमंडल में अल्पमत में होगी।

  • मजबूत विपक्ष का सामना होगा

बिहार की राजनीतिक में नीतीश कुमार (Nitish Kumar) को पहली बार मजबूत विपक्ष का सामना करना होगा। 2005 में पहली बार वह पूर्णकालिक सीएम बने थे तब से विपक्ष बिहार में कमजोर स्थिति में रहा है। इस बार विपक्ष में पहली बार उन्हें घेरने के लिए कम से कम 115 विधायक रहेंगे। विपक्ष न सिर्फ संख्या बल बल्कि तेजस्वी यादव इस चुनाव में एक मजबूत नेता के रूप उभरे हैं। ऐसे में विपक्ष नीतीश कुमार को असहज करने की हर कोशिश करेगा। तेजस्वी के साथ ओवैसी की पार्टी के मुद्दों का सामना करना नीतीश के लिए बड़ी चुनौती होगी।

  • नीतीश को अपनी खोई इमेज पाने की चुनौती

नीतीश कुमार (Nitish Kumar) भले ही सत्ता में वापसी कर गए हों, लेकिन चुनाव में जिस तरह से उनके खिलाफ लोगों की नारजगी देखने को मिली है। उससे नीतीश कुमार की सुशासन बाबू की छवि थी, उसे गहरा धक्का लगा है। चुनाव के दौरान सत्ताविरोधी लहर साफ दिख रही थी और लोग नीतीश कुमार के प्रति अपना गुस्सा जाहिर कर रहे थे। विकास और रोजगार एक बड़ा मुद्दा बिहार चुनाव में रहा है। ऐसे में नीतीश कुमार अब जब सत्ता पर काबिज होने जा रहे हैं, जो उन्हें अपने खोई हुई सुशासन बाबू की छवि को फिर से मजबूत करने की चुनौती है। इतना ही नहीं उन्होंने चुनाव के बीच में ऐलान कर दिया कि यह आखिर चुनाव है। ऐसे में लोगों की धारणा को बदलना होगा और साथ ही जेडीयू के खिसके जनाधार को पाने की चुनौती भी होगी।

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